Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
नाभिरज्यति कसम्िमेंक्षिन्नानर्थे न परिग्रहे । नाभिरज्यति चैतेषु व्यर्थत्वादू रागरोषयो:,मेरी बुद्धि किसी अनर्थमें अथवा भोगोंके संग्रहमें भी आसक्त नहीं होती है। स्त्री आदिके विषयमें जो अनुराग और शत्रु आदिके विषयमें जो क्रोध होता है, वह व्यर्थ होनेके कारण उसकी ओर मेरी बुद्धिकी प्रवृत्ति नहीं होती है
janaka uvāca | nābhirajyati kasmiṁścin nānarthe na parigrahe | nābhirajyati caiteṣu vyarthatvād rāgaroṣayoḥ ||
నా బుద్ధి అనర్థంలోనూ, పరిగ్రహ-సంగ్రహంలోనూ ఆసక్తి చెందదు. రాగద్వేషాలు వ్యర్థమని తెలిసి వాటివైపు కూడా అది ప్రవృత్తి చెందదు।
जनक उवाच