Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेद न वा कुतः । सम्बन्ध: को<स्ति भूतानां स्वैरप्पवयवैरिह,जैसे दौड़ता हुआ अच्छा घोड़ा इतनी तीव्र गतिसे एक स्थानको छोड़कर दूसरे स्थानपर पहुँच जाता है कि कुछ कहते नहीं बनता, उसी प्रकार यह प्रभावशाली लोक निरन्तर वेगपूर्वक एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें जा रहा है, अतः उसके विषयमें यह प्रश्न नहीं बन सकता कि “कौन कहाँसे आता है और कौन कहाँसे नहीं आता है, यह किसका है? किसका नहीं है? किससे उत्पन्न हुआ है और किससे नहीं हुआ है? प्राणियोंका अपने अंगोंके साथ भी यहाँ क्या सम्बन्ध है?” अर्थात् कुछ भी सम्बन्ध नहीं है
bhīṣma uvāca | kasyedaṃ kasya vā nedaṃ kuto veda na vā kutaḥ | sambandhaḥ ko 'sti bhūtānāṃ svair apy avayavair iha ||
ఇది ఎవరిది, ఎవరిది కాదు? ఇది ఎక్కడి నుండి వచ్చిందో, లేదా ఎక్కడి నుండి రాలేదో—ఎవరు నిజంగా తెలుసుకోగలరు? ఇక్కడ జీవులకు తమ అవయవాలతో కూడ నిజమైన సంబంధం ఏముంది?॥
भीष्य उवाच