Aśoka-śāstra: Nārada’s Instruction on the Cessation of Śoka
Grief
अ-क्रा् - एक प्राणायाममें पूरक, कुम्भक और रेचकके भेदसे तीन प्रेरणाएँ समझनी चाहिये। इस प्रकार जहाँ बारह प्रेरणाओंके अभ्यासका विधान किया गया है, वहाँ चार-चार प्राणायाम करनेकी विधि समझनी चाहिये। तात्पर्य यह कि रातके पहले और पिछले पहरोंमें ध्यानपूर्वक चार-चार प्राणायामोंका नित्य अभ्यास करना योगीके लिये अत्यन्त आवश्यक है। सप्तदशाधिकात्रेशततमोब ध्याय: विभिन्न अंगोंसे प्राणोंके उत्क्राणका फल तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका वर्णन और मृत्युको जीतनेका उपाय याज्ञवल्क्य उवाच तथैवोत्क्रममाणं तु शृणुष्वावहितो नृप । पदभ्यामुत्क्रममाणस्य वैष्णवं स्थानमुच्यते,याज्ञवल्क्यजी कहते हैं--नरेश्वर! देह-त्यागके समय मनुष्यके जिन-जिन अंगोंसे निकलकर प्राण जिन-जिन ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, उनके विषयमें बता रहा हूँ; तुम सावधान होकर सुनो। पैरोंके मार्गसे प्राणोंके उत्क्रमण करनेपर मनुष्यको भगवान् विष्णुके परमधामकी प्राप्ति होती बतायी जाती है
yājñavalkya uvāca | tathaivotkramamāṇaṃ tu śṛṇuṣvāvahito nṛpa | padabhyām utkramamāṇasya vaiṣṇavaṃ sthānam ucyate ||
యాజ్ఞవల్క్యుడు పలికెను—ఓ రాజా, జాగ్రత్తగా వినుము; మరణసమయంలో ప్రాణం ఎలా నిష్క్రమించునో నేను వివరిస్తున్నాను. పాదమార్గముగా ప్రాణం బయలుదేరినచో, ఆ ప్రస్థానుడు విష్ణువின் పరమధామమును పొందునని చెప్పబడింది.
याज्ञवल्क्य उवाच