अव्यक्त–पुरुष–विवेकः (Discrimination of Avyakta/Prakṛti and Puruṣa) — Yājñavalkya’s Anvīkṣikī to Viśvāvasu
न शृणोति न चाप्राति न रंस्यति न पश्यति । न च स्पर्श विजानाति न संकल्पयते मन:,जिस समय वह न तो सुनता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न देखता है और न स्पर्शका ही अनुभव करता है, जब उसके मनमें किसी प्रकारका संकल्प नहीं उठता तथा काठकी भाँति स्थित होकर वह किसी भी वस्तुका अभिमान या सुध-बुध नहीं रखता, उसी समय मनीषी पुरुष उसे अपने शुद्धस्वरूपको प्राप्त एवं योगयुक्त कहते हैं
na śṛṇoti na cāprāti na raṃsyati na paśyati | na ca sparśaṃ vijānāti na saṃkalpayate manaḥ ||
వసిష్ఠుడు పలికెను—అతడు వినడు, వాసనను గ్రహించడు, రుచిని ఆస్వాదించడు, చూడడు; స్పర్శను కూడా గుర్తించడు. మనస్సులో ఏ సంకల్పమూ లేచి రాక, కట్టెలా స్థిరంగా ఉండి ఏ విషయంపైనా ‘నాది’ అనే అభిమానం లేకున్నప్పుడు—జ్ఞానులు అతడు తన శుద్ధ స్వరూపాన్ని పొందినవాడని, యోగస్థుడని చెబుతారు।
वसिष्ठ उवाच