Utkramaṇa-sthāna and Ariṣṭa-lakṣaṇa: Yājñavalkya’s Instruction on Departure Pathways and Mortality Signs
जब यह पुरुष पचीसतवें तत्त्वस्वरूप परमात्मामें स्थित हो जाता है, तब उसकी स्थिति उत्तम बतायी जाती है--वह ठीक बर्ताव करता है, ऐसा माना जाता है। एकत्वका बोध ही ज्ञान है और नानात्वका बोध ही अज्ञान है ।। तत्त्वनिस्तत्त्वयोरेतत् पृथगेव निदर्शनम् । पज्चविंशतिसर्ग तु तत्त्वमाहुर्मनीषिण:,तत्त्व (क्षर और निस्तत्त्व (अक्षर) का यह पृथकृ-पृथक् लक्षण समझना चाहिये। कुछ मनीषी पुरुष पचीस तत्त्वोंको ही तत्त्व कहते हैं; परंतु दूसरे विद्वानोंने चौबीस जड तत्त्वोंको तो तत्त्व कहा है और पचीसवें चेतन परमात्माको निस्तत्त्व (तत्त्वसे भिन्न) बताया है। यह चैतन्य ही परमात्माका लक्षण है। महत्तत््व आदि जो विकार हैं, वे क्षरतत्त्व हैं और परम पुरुष परमात्मा उन “क्षर” तत्त्वोंसे भिन्न उनका सनातन आधार है
tattvanistattvayor etat pṛthag eva nidarśanam | pañcaviṃśatisargaṃ tu tattvam āhur manīṣiṇaḥ ||
ఏకత్వబోధనే జ్ఞానం; నానాత్వబోధనే అజ్ఞానం. ‘తత్త్వ’ మరియు ‘నిస్తత్త్వ’ అనే రెండింటి భేదాన్ని ఈ విధంగా గ్రహించాలి. కొందరు మునులు ఇరవై ఐదు తత్త్వాల సమూహాన్నే తత్త్వమని చెబుతారు; మరికొందరు పండితులు ఇరవై నాలుగు జడ తత్త్వాలను తత్త్వమని, ఇరవై ఐదవది—చేతన పరమాత్మను—నిస్తత్త్వమని, అంటే క్షర వర్గాలకు అతీతమని భావిస్తారు. పురుషుడు ఆ ఇరవై ఐదవ సత్యంలో స్థితుడైతే, అతని స్థితి ఉత్తమమని, అతని ఆచరణ సమ్యకమని చెప్పబడుతుంది.
वसिष्ठ उवाच