Adhyātma–Adhibhūta–Adhidaivata Correspondences and the Triguṇa Lakṣaṇas (Śānti-parva 301)
तमः श्वभ्रनिभं दृष्टवा वर्षबुद्बुदसंनिभम् । नाशप्रायं सुखाद्धीनं नाशोत्तरमिहावशम्,राजन्! भरतनन्दन! महाबुद्धिमान् सांख्यके विद्वान् सैकड़ों गुणोंके द्वारा गुणोंको, सैकड़ों दोषोंके द्वारा दोषोंको तथा सैकड़ों विचित्र हेतुओंसे विचित्र हेतुओंको तत्त्वतः जानकर व्यापक ज्ञानके प्रभावसे संसारको पानीके फेनके समान नश्वर, विष्णुकी सैकड़ों मायाओंसे ढँका हुआ, दीवारपर बने हुए चित्रके समान, नरकुलके समान सारहीन, अन्धकारसे भरे हुए गड़्ढेकी भाँति भयंकर, वर्षाकालके पानीके बुलबुलोंके समान क्षणभंगुर, सुखहीन, पराधीन, नष्टप्राय तथा कीचड़में फँसे हुए हाथीकी तरह रजोगुण और तमोगुणमें मग्न समझते हैं। इसलिये वे संतान आदिकी आसक्तिको दूर करके तपरूप दण्डसे युक्त विवेकरूपी शस्त्रसे राजस-तामस अशुभ गन्धोंको और सुन्दर शोभनीय सात््विक गन्धोंको तथा स्पर्शेन्द्रियके देहाश्रित भोगोंकी आसक्तिको शीघ्र ही काट डालते हैं
tamaḥ śvabhranibhaṁ dṛṣṭvā varṣabudbudasaṁnibham | nāśaprāyaṁ sukhāddhīnaṁ nāśottaram ihāvaśam, rājan bharatanandana |
భీష్ముడు అన్నాడు—ఓ రాజా, భరతనందనా! వారు ఈ లోకాన్ని అంధకారంతో నిండిన లోతైన గోతిలా భయంకరమని, వర్షాకాల బుడగలవలె క్షణభంగురమని, నాశానికి సమీపమని, సుఖరహితమని, వినాశం వైపు నిర్బంధితమై పోతున్నదని దర్శిస్తారు.
भीष्म उवाच