Śānti-parva Adhyāya 3: Karṇa’s training under Rāma Jāmadagnya and the Bhārgava restriction on the Brahmāstra
उस रक्त पीनेवाले कीड़ेने कर्णकी जाँघके पास पहुँचकर उसे छेद दिया; परंतु गुरुजीके जागनेके भयसे कर्ण न तो उसे फेंक सका और न मार ही सका ।। संदश्यमानस्तु तथा कृमिणा तेन भारत । गुरो: प्रबोधनाशड्की तमुपैक्षत सूर्यज:,भरतनन्दन! वह कीड़ा उसे बारंबार डँसता रहा तो भी सूर्यपुत्र कर्णने कहीं गुरुजी जाग न उठें, इस आशंकासे उसकी उपेक्षा कर दी
Sandaśyamānas tu tathā kṛmiṇā tena Bhārata | guroḥ prabodhanāśaṅkī tam upaikṣata sūryajaḥ ||
భరతనందనా! ఆ కృమి తొడ సమీపంలో మళ్లీ మళ్లీ కరిచినా, గురువు మేల్కొంటారేమో అన్న భయంతో సూర్యపుత్రుడు కర్ణుడు దానిని సహించి ఉపేక్షించాడు—విసరలేదు, చంపలేదు।
नारद उवाच