कामद्रुम-रूपकः तथा शरीर-पुर-रूपकः
The Desire-Tree and the Body-as-City Metaphors
रहस्यं सर्ववेदानामनैतिहमनागमम् | आत्मप्रत्ययिकं शास्त्रमिदं पुत्रानुशसनम्,बेटा! मैंने जो यह उपदेश दिया है, यह परमात्माका ज्ञान करानेवाला शास्त्र है। यही सम्पूर्ण वेदोंका रहस्य है। केवल अनुमान या आगमसे इसका ज्ञान नहीं होता, अनुभवसे ही यह ठीक-ठीक समझमें आता है मनो बुद्धि: स्वभावश्च त्रय एते स्वयोनिजा: । न गुणानतिवर्तन्ते गुणेभ्य: परमागता: मन, बुद्धि और स्वभाव (अहंभाव)-ये तीनों अपने कारणभूत पूर्वसंस्कारोंसे उत्पन्न हुए हैं। ये तीनों पाउचभौतिक होते हुए भी भूतोंके अन्य कार्य जो श्रोत्रादि हैं, उनसे श्रेष्ठ हैं तो भी गुणोंका सर्वथा उल्लंघन नहीं कर पाते हैं
vyāsa uvāca | rahasyaṁ sarvavedānām anaitihyam anāgamam | ātmapratyayikaṁ śāstram idaṁ putrānuśāsanam | mano buddhiḥ svabhāvaś ca traya ete svayonijāḥ | na guṇān ativartante guṇebhyaḥ paramāgatāḥ |
వ్యాసుడు పలికెను—కుమారా! ఇది సమస్త వేదాల రహస్యం; ఇది కేవలం పరంపరతో గాని, శ్రుతి-ఆగమమాత్రంతో గాని స్థాపితమయ్యేది కాదు. స్వానుభవంతో నిర్ధారించబడే, ఆత్మజ్ఞానాన్ని ప్రసాదించే శాస్త్రోపదేశమిది. మనస్సు, బుద్ధి, స్వభావం (అహంభావం)—ఈ మూడు తమ తమ కారణభూత సంస్కారాలనుండి పుట్టినవి. గుణాలనుండి ఉద్భవించినవిగా, అవి గుణాలను పూర్తిగా అతిక్రమించలేవు; గుణాల మధ్యనే కార్యం చేస్తాయి.
व्यास उवाच