आत्मदर्शन-उपदेशः (Ātma-darśana Upadeśa) — Mind, Senses, and the All-pervading Self
अन्य युगोंमें शास्त्रोक्त धर्मका क्रमश: एक-एक चरण क्षीण होता जाता है और चोरी, असत्य तथा छल-कपट आदिके द्वारा अधर्मकी वृद्धि होने लगती है ।। अरोगा: सर्वसिद्धार्थ श्चितुर्वर्षशतायुष: । कृते त्रेतायुगे त्वेषां पादशो हसते वय:,सत्ययुगके मनुष्य नीरोग होते हैं। उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध होती हैं तथा वे चार सौ वर्षोकी आयुवाले होते हैं। त्रेतायुग आनेपर उनकी आयु एक चौथाई घटकर तीन सौ वर्षोकी रह जाती है। इसी प्रकार द्वापरमें दो सौ और कलियुगमें सौ वर्षोकी आयु होती है
anye yugeṣu śāstroktasya dharmasya kramaśa ekaikaḥ pādaḥ kṣīyate, cauryānṛta-chala-kapaṭādibhiś cādharmasya vṛddhir bhavati. arogāḥ sarva-siddhārthāś catur-varṣa-śatāyuṣaḥ kṛte; tretā-yuge tv eṣāṃ pādaśo hrasate vayaḥ.
ఇతర యుగాలలో శాస్త్రోక్త ధర్మం క్రమంగా ఒక్కో పాదం చొప్పున క్షీణిస్తుంది; చౌర్యం, అసత్యం, ఛలకపటాల వల్ల అధర్మం పెరుగుతుంది. కృత (సత్య) యుగంలో మనుష్యులు నిరోగులు, వారి లక్ష్యాలు సిద్ధిస్తాయి, నాలుగు వందల సంవత్సరాలు జీవిస్తారు; త్రేతాయుగం రాగానే వారి ఆయుష్షు నాలుగో వంతు తగ్గుతుంది—తదుపరి యుగాలలో కూడా అలాగే క్రమంగా తగ్గుతూనే ఉంటుంది.
व्यास उवाच