Śakra–Namuci-saṃvāda: Śoka-nivāraṇa and Daiva-vicāra
Indra and Namuci on grief, composure, and inevitability
क्ा-...0.:--. ०-2 ३. जन्मके समय गर्भवास आदिके कारण जो कष्ट होता है, उसपर विचार करके शरीरसे वैराग्य होना “जातिनिर्वेद' है। २. कर्मजनित क्लेश--नाना योनियोंकी प्राप्ति एवं नरकादि यातनाका विचार करके पाप तथा काम्य-कर्मोंसे विरत होना “कर्मनिर्वेद' है। ३. इस जगत्की छोटी-से-छोटी वस्तुओंसे लेकर ब्रह्मतोकतकके भोगोंकी क्षणभंगुरता और दुःखरूपताका विचार करके सब ओरसे विरक्त होना 'सर्वनिर्वेद” कहलाता है। > जाति कहते हैं जन्मको। जैसे गुड़ या महुवे आदिसे अनेक द्रव्योंके संयोगद्वारा जो मद्य तैयार किया जाता है, उसमें उपादानकी अपेक्षा विलक्षण मादकशक्तिका जन्म हो जाता है, उसी प्रकार पृथ्वी, जल, तेज और वायु--इन चार द्रव्योंके संयोगसे इस शरीरमें ही जीव चैतन्य प्रकट हो जाता है। जैसे जड मनसे अजड स्मृति उत्पन्न होती है, उसी प्रकार जड शरीरसे चेतन जीवकी उत्पत्ति हो जाती है। जैसे अयस्कान्तमणि (चुम्बक) जड होकर भी लोहको खींच लेती है, उसी प्रकार जड शरीर भी इन्द्रियोंका संचालन और नियन्त्रण कर लेता है; अतः आत्मा उससे भिन्न नहीं है। जैसे सूर्यकान्तमणि शीतल होकर भी सूर्यकी किरणोंके संयोगसे आग प्रकट करने लगती है, उसी प्रकार वीर्य शीतल होकर भी रस और रक्तके संयोगसे जठरानलका आविष्कार करता है और जैसे जलसे उत्पन्न हुआ बडवानल जलको ही भक्षण करता है, उसी प्रकार वीर्यसे उत्पन्न हुआ यह शरीर स्वयं भी वीर्यका आधान एवं धारण करता है। अत: शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। एकोनविशर्त्याधिकॉद्विशततमो< ध्याय: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान भीष्म उवाच जनको जनदेवस्तु ज्ञापित: परमर्षिणा । पुनरेवानुपप्रच्छ साम्पराये भवाभवौ,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! महर्षि पंचशिखके इस प्रकार उपदेश देनेपर जनदेव जनककने पुनः उनसे मृत्युके पश्चात् आत्माकी सत्ता या विनाशके विषयमें प्रश्न किया
bhīṣma uvāca | janako janadevas tu jñāpitaḥ paramarṣiṇā | punar evānupapraccha sāmparāye bhavābhavau ||
భీష్ముడు పలికెను—రాజా! పరమర్షి ఉపదేశముచే బోధింపబడిన జనకుడు, జనదేవుడని ప్రసిద్ధుడై, మరణానంతరం పరలోకంలో ఆత్మ ఉన్నదా లేనిదా అని మళ్లీ ప్రశ్నించాడు.
भीष्म उवाच
The verse frames a central moksha-question: after death, is there continued existence (bhava) or non-existence (abhava)? Janaka’s follow-up pushes the teacher to clarify the metaphysical basis on which renunciation, moral restraint, and liberation are meaningful.
After receiving instruction from the great sage (identified in the chapter context as Panchashikha), King Janaka/Janadeva asks another question—specifically about the post-mortem fate of the self: survival versus destruction.