Adhyāya 189: Japa—Inquiry into the Jāpaka, Method
Vidhi), and Fruit (Phala
- जैसे लोहा दाहक एवं दीप्तिमान् हो उठता है, उसी प्रकार चेतन जीवके संसर्गसे उसके सत्त्वादि गुणको भी चैतन्ययुक्त कहते हैं। अष्टा शीर्त्याधिकशततमोब् ध्याय: वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन भूगुरुवाच असृजद् ब्राह्मुणानेव पूर्व ब्रह्मा प्रजापतीन् । आत्मतेजोभिनिर्वत्तान् भास्कराग्निसमप्रभान्,भगुजी कहते हैं--मुने! ब्रह्माजीने सृष्टिके प्रारम्भमें अपने तेजसे सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले ब्राह्मणों, मरीचि आदि प्रजापतियोंको ही उत्पन्न किया
bharadvāja uvāca | asṛjad brāhmaṇān eva pūrvaṁ brahmā prajāpātīn | ātma-tejobhinirvattān bhāskarāgni-samaprabhān ||
భరద్వాజుడు పలికెను—సృష్టి ఆరంభంలో ప్రజాపతి బ్రహ్మ తన స్వతేజస్సు నుండే జనించిన, సూర్యాగ్నులవలె ప్రకాశించే బ్రాహ్మణులను—మరీచి మొదలైన ప్రజాపతులను—ముందుగా సృష్టించాడు।
भरद्वाज उवाच