मृत्यु-काल-प्रबोधनम् (Instruction on Mortality, Time, and Truth) — Mahābhārata, Śānti-parva 169
लुब्ध: क्रूरस्त्यक्तरर्मा निकृति: शठ एव च | क्षुद्र पापसमाचार: सर्वशड्की तथालस:,जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निनन््दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात् विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंस मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये। जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है। अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो
lubdhaḥ krūraḥ tyaktadharmo nikṛtiḥ śaṭha eva ca | kṣudraḥ pāpasamācāraḥ sarvaśaṅkī tathālasaḥ ||
భీష్ముడు పలికెను—లోభి, క్రూరుడు, ధర్మాన్ని విడిచినవాడు, కపటుడు, శఠుడు; క్షుద్రబుద్ధి, పాపాచారుడు, అందరిపై అనుమానపడేవాడు, ఆలస్యం చేసే వాడు—అటువంటి వానితో సంధి చేయరాదు. ఎల్లప్పుడూ ఇతరుల లోపాలనే వెదకేవాడూ సంధికి అర్హుడు కాదు. ఇక సంధికి యోగ్యులైన పురుషులను నేను చెప్పుచున్నాను—విను.
भीष्म उवाच
Bhishma teaches that alliances (sandhi) should not be made with people whose character is dominated by greed, cruelty, abandonment of dharma, deceit, petty wickedness, chronic suspicion, and laziness—because such traits make them unreliable and dangerous partners.
In the Shanti Parva’s instruction on conduct and governance, Bhishma is advising Yudhishthira about political prudence: first listing the types of persons to avoid in making pacts, and then transitioning to describe who is suitable for alliance.