बक-गौतमाख्यानम् / The Baka–Gautama Account
On Gratitude and Friendship Ethics
उवाच स तु धर्मज्ञो धरनुर्वेदस्य पारग: । शरतल्पगतो भीष्मो नकुलाय महात्मने,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतनन्दन! जनमेजय! बुद्धिमान् माद्रीपुत्र नकुलकी वह बात कौशलयुक्त तो थी ही, सूक्ष्म तथा विचित्र अर्थसे भी सम्पन्न थी। उसे सुनकर बाणशय्यापर सोये हुए धनुर्वेदके पारड्गत विद्वान् धर्मज्ञ भीष्मने शिक्षाप्राप्त महामनस्वी द्रोणशिष्य नकुलको सुन्दर स्वर एवं वर्णोंसे युक्त वाणीमें इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया
vaiśampāyana uvāca | uvāca sa tu dharmajño dhanuḥvedasya pāragāḥ | śaratālpagato bhīṣmo nakulāya mahātmane ||
వైశంపాయనుడు అన్నాడు—ధర్మజ్ఞుడూ ధనుర్వేదపారగుడూ అయిన, శరశయ్యపై ఉన్న భీష్ముడు మహాత్ముడైన నకులునికి ప్రత్యుత్తరం పలకడం ప్రారంభించాడు.
वैशम्पायन उवाच