Daṇḍa as the Foundation of Social Order (दण्डप्रतिष्ठा)
दण्डश्नेन्न भवेललोके विनश्येयुरिमा: प्रजा: । जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलान्ू बलवत्तरा:,यदि संसारमें दण्ड न रहे तो यह सारी प्रजा नष्ट हो जाय; और जैसे जलनमें बड़े मत्स्य छोटी मछलियोंको खा जाते हैं उसी प्रकार प्रबल जीव दुर्बल जीवोंको अपना आहार बना लें
లోకంలో దండం లేకపోతే ఈ ప్రజలంతా నశించిపోతారు; నీటిలో పెద్ద చేపలు చిన్న చేపలను మింగినట్లే, బలవంతులు బలహీనులను భక్షిస్తారు.
अजुन उवाच