Kośa, Bala, and Maryādā: Treasury, Capacity, and Enforceable Limits (कोश-बल-मर्यादा)
अनन्तरं क्षत्रियस्य तत्र कि विचिकित्स्यते | यथास्य धर्मों न ग्लायेन्नेयाच्छत्रुवशं यथा । तत् कर्तव्यमिहेत्याहुर्नात्मानवसादयेत्,आपत्ति दूर होनेके बाद क्षत्रियको क्या करना चाहिये? वह प्रायश्नित्त करे या प्रजासे कर लेना छोड़ दे; यह संशय उपस्थित होता है। इसका समाधान यह है कि वह ऐसा बर्ताव करे जिससे उसके धर्मको हानि न पहुँचे तथा उसे शत्रुके अधीन न होना पड़े। विद्वानोंने उसके लिये यही कर्तव्य बतलाया है, वह किसी तरह अपने-आपको संकटमें न डाले
anantaraṃ kṣatriyasya tatra kiṃ vicikitsyate | yathāsya dharmo na glāyen neyāc chatrūvaśaṃ yathā | tat kartavyam ihāty āhur nātmānam avasādayet |
భీష్ముడు పలికెను—ఆపద తొలగిన తరువాత క్షత్రియునికి ఇంకేమి సందేహం? తన ధర్మము క్షీణించకుండా, శత్రువశమున పడకుండా ఉండునట్లు అతడు ప్రవర్తించవలెను. జ్ఞానులు ఇదే ఇక్కడ అతని కర్తవ్యమని ప్రకటించారు; అతడు తనను తాను దిగజార్చకూడదు, మళ్లీ ఆపదలో పడకూడదు।
भीष्म उवाच