धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! पाण्डवलोग यहाँ जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए यात्रा कर रहे हैं, उसका क्या रहस्य है, यह बताओ। वे क्यों इस प्रकार जा रहे हैं? ।। विदुर उवाच निकृतस्यापि ते पुनत्रैहते राज्ये धनेषु च । न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमत:,विदुर बोले--महाराज! यद्यपि आपके पुत्रोंने छलपूर्ण बर्ताव किया है। पाण्डवोंका राज्य और धन सब कुछ चला गया है तो भी परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्लिरकी बुद्धि धर्मसे विचलित नहीं हो रही है
vidura uvāca | nikṛtasya api te punaḥ traihate rājye dhaneṣu ca | na dharmāc calate buddhir dharmarājasya dhīmataḥ ||
విదురుడు అన్నాడు—మహారాజా! మీ కుమారులు కపటంతో పాండవుల రాజ్యమును, ధనమును హరించినా, పరమ వివేకవంతుడైన ధర్మరాజు యుధిష్ఠిరుని బుద్ధి ధర్మం నుండి చలించదు.
विदुर उवाच