यह प्राणधारणरूपी धर्म अनित्य है, एक-न-एक दिन इसका अन्त होना निश्चित है, फिर भी विधाताने न जाने क्यों प्रमादवश मेरे जीवनका भी शीघ्र ही अन्त नहीं नियत कर दिया। तभी तो आयु मुझे छोड़ नहीं रही है ।। हा कृष्ण द्वारकावासिन् क्वासि संकर्षणानुज । कस्मान्न त्रायसे दुःखान्मां चेमांश्व॒ नरोत्तमान्,हा द्वारकावासी श्रीकृष्ण! तुम कहाँ हो! बलरामजीके छोटे भैया! मुझको तथा इन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको इस दुःखसे क्यों नहीं बचाते?
ha kṛṣṇa dvārakāvāsin kvāsi saṅkarṣaṇānuja | kasmān na trāyase duḥkhān māṃ cemaṃś ca narottamān ||
హాయ్ ద్వారకావాసి కృష్ణా! నీవెక్కడ ఉన్నావు, సంకర్షణుని (బలరాముని) అనుజా? నన్ను మరియు ఈ నరశ్రేష్ఠులను ఈ దుఃఖం నుంచి ఎందుకు రక్షించవు?
वैशमग्पायन उवाच