न वैराण्यभिजानन्ति गुणान् पश्यन्ति नागुणान् । विरोधं नाधिगच्छन्ति ये त उत्तमपूरुषा:,जो पुरुष वैरको याद नहीं रखते, गुणोंको ही देखते हैं, अवगुणोंको नहीं तथा किसीसे विरोध नहीं रखते, वे ही उत्तम पुरुष कहे गये हैं। साधु पुरुष दूसरोंके सत्कर्मों (उपकारादि)- को ही याद रखते हैं, उनके किये हुए वैरको नहीं। वे दूसरोंकी भलाई तो करते हैं; परंतु उनसे बदला लेनेकी भावना नहीं रखते
yudhiṣṭhira uvāca | na vairāṇy abhijānanti guṇān paśyanti nāguṇān | virodhaṁ nādhigacchanti ye te uttama-pūruṣāḥ ||
వైరం గుర్తుపెట్టుకోని వారు, దోషాలను కాక గుణాలనే చూసేవారు, ఎవరివిషయమై విరోధంలోకి వెళ్లని వారు—వారే ఉత్తమ పురుషులు.
युधिछिर उवाच