Dyūta-āhvāna: Śakuni’s Proposal, Vidura’s Warning, and the Summons of Yudhiṣṭhira
Sabhā-parva 51
एकपादांश्व॒ तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान् । राजानो बलिमादाय नानावर्णाननेकश:,द्रयक्ष, त््यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद--इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे
ekapādāṁś ca tatrāham apaśyaṁ dvāri vāritān | rājāno balim ādāya nānāvarṇān anekaśaḥ ||
అక్కడనే నేను ఏకపాద దేశపు రాజులను కూడా ద్వారమున ఆపబడినవారిగా చూచితిని. వారు అనేక విధముల, అనేక వర్ణముల బలి-భేటీలను తీసుకొని వచ్చారు.
दुर्योधन उवाच