Adhyāya 33: Antarvedī-Samāgama, Arghya-Nirṇaya, and Śiśupāla’s Objection
नस्ममा न (0) आसजअन+- - इसीको आजकल रोहतक (पंजाब) कहते हैं। (राजसूयपर्व) त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना वैशम्पायन उवाच (एवं निर्जित्य पृथिवीं भ्रातर: कुरुनन्दन । वर्तमाना: स्वधर्मेण शशासु: पृथिवीमिमाम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--कुशनन्दन! इस प्रकार सारी पृथ्वीको जीतकर अपने धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए पाँचों भाई पाण्डव इस भूमण्डलका शासन करने लगे। चतुर्भिर्भीमसेनाद्यैर्भ्रातृभि: सहितो नृप: । अनुग॒ृहा प्रजा: सर्वा: सर्ववर्णानगोपयत् ।। भीमसेन आदि चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्छिर सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह करते हुए सब वर्णके लोगोंको संतुष्ट रखते थे। अविरोधेन सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिर: । प्रीयतां दीयतां सर्व मुक्त्वा कोषं बल॑ं विना ।। साधु धर्मेति पार्थस्य नान्यच्छुयेत भाषितम् । युधिष्ठिर किसीका भी विरोध न करके सबके हितसाधनमें लगे रहते थे। “सबको तृप्त एवं प्रसन्न किया जाय, खजाना खोलकर सबको खुले हाथ दान दिया जाय, किसीपर बलप्रयोग न किया जाय, धर्म! तुम धन्य हो।” इत्यादि बातोंके सिवा युधिष्ठिरके मुखसे और कुछ नहीं सुनायी पड़ता था। एवंवृत्ते जगत् तस्मिन् पितरीवान्वरज्यत ।। न तस्य विद्यते द्वेष्ठा ततो5स्थाजात शत्रुता ।) उनके ऐसे बर्तावके कारण सारा जगत् उनके प्रति वैसा ही अनुराग रखने लगा, जैसे पुत्र पिताके प्रति अनुरक्त होता है। राजा युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था, इसीलिये वे “अजातशत्रु' कहलाते थे। रक्षणाद् धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात् | शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरता: प्रजा:,धर्मराज युधिष्छिर प्रजाकी रक्षा, सत्यका पालन और शत्रुओंका संहार करते थे। उनके इन कार्योसे निश्चिन्त एवं उत्साहित होकर प्रजावर्गके सब लोग अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोके पालनमें संलग्न रहते थे
vaiśampāyana uvāca | evaṃ nirjitya pṛthivīṃ bhrātaraḥ kurunandana | vartamānāḥ svadharmeṇa śaśāsuḥ pṛthivīm imām ||
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఓ కురునందనా! ఈ విధంగా భూమండలమంతటిని జయించి, తమ తమ ధర్మాన్ని అనుసరించి ప్రవర్తిస్తూ, ఆ సోదరులు ఈ లోకాన్ని పాలించసాగారు. భీమసేనాది నలుగురు సోదరులతో కూడిన రాజు యుధిష్ఠిరుడు సమస్త ప్రజలపై అనుగ్రహం చూపుతూ అన్ని వర్ణాల వారిని రక్షించెను. యుధిష్ఠిరుడు ఎవరికీ విరోధం కలగనీయక అందరి హితమే కోరెను. “అందరినీ తృప్తిపరచండి; కోశాన్ని తెరిచి దానం చేయండి; బలప్రయోగం చేయవద్దు; ధర్మం ధన్యము”—ఇవే పార్ధుని నోట వినబడేవి. అతని ఆచరణవల్ల జగత్తు తండ్రిపై కుమారుని ప్రేమవలె అతనిపై అనురక్తమైంది. అతనికి ద్వేషి ఎవరూ లేక ‘అజాతశత్రు’ అని ప్రసిద్ధి పొందెను. ధర్మరాజు రక్షణ, సత్యపాలన, శత్రునాశం వలన ప్రజలు నిశ్చింతగా తమ తమ వర్ణాశ్రమోచిత కర్మలలో నిమగ్నులై ఉండిరి.
वैशम्पायन उवाच
Legitimate rule is grounded in svadharma: power gained (even by conquest) must be exercised through righteous conduct, restraint, and duty-based governance rather than personal whim.
After establishing supremacy over the realm, the Pāṇḍava brothers begin ruling the earth; the narrator Vaiśampāyana frames their reign as one conducted according to dharma, setting the stage for the Rajasuya-related developments in this section.