Jarāsandha–Vāsudeva Saṃvāda: Kṣātra-Dharma, Pride, and the Ethics of Coercion
Sabhā Parva, Adhyāya 20
अमषदिभिततप्तानां ज्ञात्यर्थ मुख्यतेजसाम् । रविसोमाग्निवपुषां दीप्तमासीत् तदा वपु:,जरासंधके प्रति रोषके कारण वे प्रज्वलित-से हो रहे थे। जाति-भाइयोंके उद्धारके लिये उनका महान् तेज प्रकट हुआ था। उस समय सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके समान तेजस्वी शरीरवाले उन तीनोंका स्वरूप अत्यन्त उद्धासित हो रहा था। एक ही कार्यके लिये उद्यत हुए और युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले उन दोनों (कृष्णोंको अर्थात् नर-नारायणरूप कृष्ण और अर्जुन)-को भीमसेनको आगे लिये जाते देख युधिष्ठिरको निश्चय हो गया कि जरासंध अवश्य मारा जायगा
amṛṣadbhir ataptānāṁ jñāty-arthaṁ mukhya-tejasām | ravi-somāgni-vapuṣāṁ dīptam āsīt tadā vapuḥ ||
జరాసంధుని పట్ల అసహ్యమైన కోపంతో వారు అంతరంగంలో తప్తులై ఉన్నారు; బంధువుల రక్షణార్థం వారి ప్రధాన తేజస్సు ప్రకాశించింది. ఆ వేళ సూర్యుడు, చంద్రుడు, అగ్ని వంటి కాంతిమంతమైన దేహాలు కలిగిన ఆ ముగ్గురి రూపం అత్యంత దీప్తంగా వెలిగింది.
वैशग्पायन उवाच