अर्जुनकर्णसंनिपातवर्णनम् / The Convergence of Arjuna and Karṇa
जिस दुष्टबुद्धिवाले कर्णने कौरव-वीरोंके बीच भरी सभामें द्रौपदीसे कहा था कि 'कृष्णे! तू इन अत्यन्त दुर्बल, पतित और शक्तिहीन पाण्डवोंको छोड़ क्यों नहीं देती?” ।। योड्सौ कर्ण: प्रत्यजानात्त्वदर्थ नाहं हत्वा सह कृष्णेन पार्थम् | इहोपयातेति स पापबुद्धि: कच्चिच्छेते शरसम्मभिन्नगात्र:,“जिस कर्णने तुम्हारे लिये यह प्रतिज्ञा की थी कि “आज मैं श्रीकृष्णसहित अर्जुनको मारे बिना यहाँ नहीं लौटूँगा” क्या वह पापात्मा तुम्हारे बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर पड़ा है?
yo 'sau karṇaḥ pratyajānāt tvad-arthaṃ nāhaṃ hatvā saha kṛṣṇena pārtham | ihopeyāteti sa pāpa-buddhiḥ kaccic chete śara-samabhinna-gātraḥ ||
యుధిష్ఠిరుడు అన్నాడు—దుష్టబుద్ధి కర్ణుడు నీ కోసం ఈ ప్రతిజ్ఞ చేశాడు—‘ఈ రోజు శ్రీకృష్ణునితో కూడిన పార్థుడు (అర్జునుడు)ను సంహరించకుండా నేను ఇక్కడికి తిరిగి రాను’ అని. ఆ పాపాత్ముడు ఇప్పుడు నీ బాణాలతో చీల్చి చీల్చబడి భూమిపై పడి ఉన్నాడా?
युधिषछ्िर उवाच