कर्णसेनापत्यारम्भः — Karṇa’s Appointment and the Report to Dhṛtarāṣṭra
Chapter 1
अड--रू- ॥। ३० श्रीपरमात्मने नम: ।। श्रीमहाभारतम् कर्णपर्व प्रथमो< ध्याय: कर्णवधका संक्षिप्त 23338 7488 जनमेजयका वैशम्पायनजीसे उसे कहनेका अनुरोध नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।। “अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।' वैशम्पायन उवाच ततो द्रोणे हते राजन् दुर्योधनमुखा नृपा: । भृशमुद्विग्नमनसो द्रोणपुत्रमुपागमन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! ट्रोणाचार्यके मारे जानेपर दुर्योधन आदि राजाओंका मन अत्यन्त उद्विग्न हो गया था। वे सब-के-सब द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके पास आये
vaiśampāyana uvāca | tato droṇe hate rājan duryodhana-mukhā nṛpāḥ | bhṛśam udvigna-manaso droṇa-putram upāgaman ||
నారాయణునికి, నరోత్తముడైన నరునికి (అర్జునునికి), దేవి సరస్వతికి, వ్యాస మహర్షికి నమస్కరించి తరువాత ‘జయ’ (మహాభారతం)ను పఠించాలి. వైశంపాయనుడు అన్నాడు—రాజా! ద్రోణుడు హతుడైన తరువాత దుర్యోధనాది రాజులు హృదయమందు తీవ్రంగా కలతచెంది ద్రోణపుత్రుడైన అశ్వత్థాముని వద్దకు వెళ్లారు.
वैशम्पायन उवाच