या शक्तिर्यच्च विज्ञानं यद् वीर्य यच्च पौरुषम् । धार्तरिष्ट्रेषु या प्रीतिद्वेषो5स्मासु च यश्व ते,“आचार्यपुत्र! तुममें जो शक्ति, जो विज्ञान, जो बल-पराक्रम, जो पुरुषार्थ, कौरवोंपर जो प्रेम तथा हमलोगोंपर जो तुम्हारा द्वेष हो, साथ ही तुममें जो तेज और प्रभाव हो, वह सब मुझपर दिखाओ। द्रोणाचार्यका वध करनेवाला वह धृष्टद्युम्न ही तुम्हारा सारा घमंड चूर कर देगा
yā śaktir yac ca vijñānaṃ yad vīryaṃ yac ca pauruṣam | dhārtarāṣṭreṣu yā prītir dveṣo ’smāsu ca yaś ca te ||
ఆచార్యపుత్రా! నీలో ఉన్న శక్తి, విజ్ఞానం, వీర్యం, పౌరుషం; ధృతరాష్ట్రపుత్రులపై నీకు ఉన్న ప్రీతి, మాపై ఉన్న ద్వేషం—ఇవన్నీ నాపై ఈనాడు చూపుము।
संजय उवाच