Droṇa–Arjuna Yuddha; Trigarta-Āvaraṇa; Bhīmasena Gajānīka-bheda
Droṇa and Arjuna Engage; Trigarta Containment; Bhīma Breaks the Elephant Corps
इस प्रकार श्रीमह् भारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वरमें आठवें दिनके युद्धमें घटोत्कचका युद्धविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९४ ॥। #+>.ोी >> | न हि कक पञ्चनवतितमो< ध्याय: दुर्योधनके अनुरोध और भीष्मजीकी आज्ञासे भगदत्तका घटोत्कच, भीमसेन और पाण्डव-सेनाके साथ घोर युद्ध संजय उवाच तस्मिन् महति संक्रन्दे राजा दुर्योधनस्तदा । (पराजयं राक्षसेन नामृष्यत परंतप: ।) गाड़ेयमुपसंगम्य विनयेनाभिवाद्य च,कथयामास दुर्धर्षो विनि:श्वस्य पुनः पुनः । संजय कहते हैं--महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाला राजा दुर्योधन उस महान् युद्धमें एक राक्षसके द्वारा प्राप्त हुई अपनी पराजयको नहीं सह सका। उसने गंगानन्दन भीष्मजीके पास जाकर उन्हें विनीतभावसे प्रणाम करनेके पश्चात् सारा वृत्तान्त यथावत् रूपसे कह सुनाया। उस दुर्धर्ष वीरने बारंबार लम्बी साँस खींचकर घटोत्कचकी विजय और अपनी पराजयकी कथा कही इस प्रकार श्रीमह्या भारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्यवधपर्वमें भगदत्तका युद्धाविषयक पंचानबेवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/ ९५ ॥। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८७ श्लोक हैं।] जीन जन लि ंडहडइड: - प्रलयकालकी अग्निका नाम संवर्तक है। षण्णवतितमोब< ध्याय: इरावानके वधसे का का दुःखपूर्ण उद्गार, भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके नौ पुत्रोंका वध, अभिमन्यु और अम्बष्ठका युद्ध, युद्धकी भयानक स्थितिका वर्णन तथा आठवें दिनके युद्धका उपसंहार संजय उवाच पुत्रं विनिहतं श्रुत्वा इरावन्तं धनंजय: । दुःखेन महता<<विष्टो निःश्वसन् पन्नगो यथा
sañjaya uvāca | tasmin mahati saṅkrande rājā duryodhanas tadā | parājayaṃ rākṣasena nāmṛṣyata parantapaḥ | gāṅgeyām upasaṅgamya vinayenābhivādya ca | kathayāmāsa durdharṣo viniḥśvasya punaḥ punaḥ |
సంజయుడు పలికెను—మహారాజా! ఆ మహా సంగ్రామంలో శత్రువులను తపింపజేసే దుర్యోధనుడు, ఒక రాక్షసుని చేత తనకు కలిగిన పరాజయాన్ని సహించలేకపోయాడు. గంగానందనుడైన భీష్ముని సమీపించి వినయంతో నమస్కరించి, జరిగినదంతా యథాతథంగా చెప్పడం ప్రారంభించాడు.
संजय उवाच