Viśvarūpa-darśana (The Vision of the Universal Form) — महायोगेश्वरस्य विश्वरूपदर्शनम्
सम्बन्ध-- यमस्त विश्वकी उपासना भ्रगवान्की ही उपासना कैसे है--यह स्पष्ट समझानेके लिये अब चार शलोकोंद्वाय भगवान् इस बातका प्रतिपादन करते हैं कि समस्त जगत् मेरा ही स्वरूप है-- अहं क्रतुरहं! यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्ः | मन्त्रो5हमहमेवाज्यमहमग्निरहंरं हुतम्,क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, ओषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ
arjuna uvāca — ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣadham | mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam ||
క్రతువు నేనే, యజ్ఞము నేనే; స్వధా నేనే, ఔషధి నేనే. మంత్రం నేనే, ఘృతం నేనే; అగ్ని నేనే, హవనరూప ఆహుతి కూడా నేనే.
अजुन उवाच