१४-अनायक्तभावसे कर्म करनेसे परमात्माकी प्राप्ति होती है (गीता ३/१९)। १५-पूर्वकालमें जनकादिने भी कमोद्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी (गीता ३/२०/। १६-दूसरे मनुष्य श्रेष्ठ महापुरुषका अनुकरण करते हैं; इसलिये श्रेष्ठ महापुरुषको कर्म करना चाहिये (गीता ३॥२१)। १७-भगवान्को कुछ भी कर्तव्य नहीं है; तो भी वे लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हैं (गीता ३/२२)। १८-ज्ञानीके लिये कोई कर्तव्य नहीं है, तो भी उसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करना चाहिये (गीता ३/२५)। १९-ज्ञानीको स्वयं विहित कर्मोंका त्याग करके या कर्मत्यायका उपदेश देकर किसी प्रकार भी लोगोंको कर्तव्यकर्मसे विचलित न करना चाहिये वरं स्वयं कर्म करना और दूसरोंसे करवाना चाहिये (गीता ३/२६/। २०-ज्ञानी महापुरुषको उचित है कि विहित क्मोंका स्वरूपत: त्याग करनेका उपदेश देकर कमसिक्त मनुष्योंको विचलित न करे (गीता ३/२९॥। इस प्रकार कमोंकी अवश्यकर्तव्यताका प्रतिपादन करके अब भगवान् अर्जुनकी दूसरे #लोकमें की हुई प्रार्थाके अनुसार उसे परम कल्याणकी प्राप्तिका ऐकान्तिक और सर्वश्रेष्ठ निश्चित साधन बतलाते हुए युद्धके लिये आज्ञा देते हैं-- मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्नि्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:,मुझ अन्तर्यामी परमात्मामें लगे हुए चित्तद्वारा सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करकेः आशारहित, ममतारहित और संतापरहित होकर युद्ध कर
mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātma-cetasā | nirāśīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigata-jvaraḥ ||
అధ్యాత్మచేతనతో సమస్త కర్మలను నాలో సమర్పించి, ఆశలేని వాడై, మమకారరహితుడై, జ్వరరహితుడై యుద్ధం చేయి.
अजुन उवाच
Perform your duty while surrendering all actions to the Lord: act without craving for outcomes (nirāśīḥ), without possessiveness (nirmamaḥ), and without inner agitation (vigata-jvaraḥ). This is Karma Yoga—outer action with inner renunciation and God-centered intention.
On the battlefield, Arjuna is being instructed to fight. Krishna concludes a section on the necessity of action for maintaining social order (lokasaṅgraha) and commands Arjuna to engage in war as dharma, but with a mind anchored in the Self and free from personal desire.