भीमसेनस्य बहुमहारथसंयुगः
Bhīmasena’s Engagement with Multiple Mahārathas
चेदि, काशि और करूष देशके चौदह हजार विख्यात महारथी थे। वे उच्चकुलमें उत्पन्न होकर पाण्डवोंके लिये अपना शरीर निछावर कर चुके थे। उनमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखानेवाला नहीं था। उन सबकी ध्वजाएँ सोनेकी बनी हुई थीं। मुँह बाये हुए कालके समान भीष्मजीके सामने पहुँचकर वे सब-के-सब महारथी युद्धरूपी समुद्रमें डूब गये। भीष्मजीने घोड़े, रथ और हाथियोंसहित उन सबको परलोकका पथिक बना दिया ।। १८-- २० || भग्नाक्षोपस्करान् कांश्रचिद् भग्नचक्रांश्व भारत । अपश्याम महाराज शतशो5थ सहस्रश:,भरतनन्दन! महाराज! हमने वहाँ सैकड़ों और हजारों ऐसे रथ देखे, जिनके धुरे आदि सामान टूट गये थे और पहियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे
bhagnākṣopaskarān kāṁścid bhagnacakrāṁś ca bhārata | apaśyāma mahārāja śataśo 'tha sahasraśaḥ ||
సంజయుడు పలికెను—ఓ భారతా, మహారాజా! అక్కడ మేము వందల సంఖ్యలో, వేల సంఖ్యలో రథాలను చూశాము; వాటి అక్షాలు, ఉపకరణాలు విరిగిపోయి, చక్రాలు చిత్తుచిత్తుగా అయ్యాయి.
संजय उवाच