भीष्म-पर्व अध्याय १०० — त्रिगर्त-आक्रमण, भीष्म-केन्द्रित पुनर्संयोजन, तथा शक्त्यस्त्र-विनिमय
तस्मादर्हसि गाज़्ेय कृपां कर्तु मयि प्रभो । जहि पाण्डुसुतान् वीरान् महेन्द्र इव दानवान्,इसके बाद नेत्रोंमें आँसू भरकर हाथ जोड़े हुए गदगद कण्ठसे वह भीष्मसे इस प्रकार बोला--“शत्रुसूदन! हमलोग आपका आश्रय लेकर युद्धके मैदानमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंको भी जीतनेका उत्साह रखते हैं; फिर मित्रों और बान्धवोंसहित वीर पाण्डवोंको जीतना कौन बड़ी बात है। अतः प्रभो! गंगानन्दन! आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये। जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार आप वीर पाण्डवोंको मार डालिये
tasmād arhasi gāṅgeya kṛpāṁ kartu mayi prabho | jahi pāṇḍusutān vīrān mahendra iva dānavān ||
కాబట్టి, ఓ గాంగేయా, ఓ ప్రభూ! నాపై కరుణ చూపుము. మహేంద్రుడు దానవులను సంహరించినట్లే, నీవు వీరులైన పాండుపుత్రులను సంహరించుము.
कर्ण उवाच