Aśvamedha-dīkṣā, Vyāsa’s horse-release, and Arjuna’s departure with Gāṇḍīva (आश्वमेधिक-दीक्षा तथा हय-उत्सर्गः)
व बछ। डिश द्विसप्ततितमो< ध्याय: व्यासजीकी आज्ञासे अश्वकी रक्षाके लिये अर्जुनकी, राज्य और नगरकी रक्षाके लिये भीमसेन और नकुलकी तथा कुटुम्ब-पालनके लिये सहदेवकी नियुक्ति वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कृष्णेन धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । व्यासमामन्त्रय मेधावी ततो वचनमत्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर मेधावी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने व्यासजीको सम्बोधित करके कहा--“भगवन्! जब आपको अअश्वमेध यज्ञ आरम्भ करनेका ठीक समय जान पड़े तभी आकर मुझे उसकी दीक्षा दें; क्योंकि मेरा यज्ञ आपके ही अधीन है”
Vaiśampāyana uvāca: evam uktas tu kṛṣṇena dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | vyāsam āmantya medhāvī tato vacanam abravīt ||
వైశంపాయనుడు పలికెను—హే జనమేజయా! శ్రీకృష్ణుడు అలా చెప్పిన తరువాత మేధావి ధర్మసుతుడు యుధిష్ఠిరుడు వ్యాసమునిని సంబోధించి ఇలా అన్నాడు—“భగవన్! అశ్వమేధ యజ్ఞాన్ని ప్రారంభించుటకు తగిన కాలమని మీరు నిర్ణయించినప్పుడు వచ్చి నాకు దీక్షను ప్రసాదించండి; ఎందుకంటే నా యజ్ఞం సంపూర్ణంగా మీ ఆధీనమే.”
वैशम्पायन उवाच