Mokṣa-dharma Yoga-Upadeśa: Equanimity, Sense-Restraint, and Vision of the Ātman (आत्मदर्शन-योगोपदेशः)
अकर्मवान् विकाडृक्षश्न पश्येज्जगदशाश्वतम् । अश्वत्थसदृशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम्,जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्को अभश्वत्थके समान अनित्य--कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है
కర్తృత్వాభిమానాన్ని ధరించని వాడు, కోరికలేని వాడు, ఈ జగత్తును అశ్వత్థ వృక్షంలా అశాశ్వతమని దర్శించే వాడు, ఎల్లప్పుడూ దీనిని జనన-మరణ-జరాలతో కూడినదిగా తెలిసికొనే వాడు—అతడు విరక్తిదృష్టితో యథార్థాన్ని చూస్తాడు.
ब्राह्मण उवाच