Nārada’s Exempla of Tapas and Assurance to Dhṛtarāṣṭra (नारदोपदेशः—तपःसिद्ध्युदाहरणम्)
वानेयपुष्पनिकरैराज्यधूमोद्गमैरपि । ब्राह्मेण वपुषा युक्ता युक्तता मुनिगणस्य ता:,उन्होंने देखा, वहाँ आश्रमोंमें यज्ञकी वेदियाँ बनी हैं, जिनपर अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे हैं। मुनिलोग स्नान करके उन वेदियोंके पास बैठे हैं और अग्निमें आहुति दे रहे हैं। वनके फूलों और घृतकी आहुतिसे उठे हुए धूमोंसे भी उन वेदियोंकी शोभा हो रही है। वहाँ निरन्तर वेदध्वनि होनेके कारण मानो वे वेदियाँ वेदमय शरीरसे संयुक्त जान पड़ती थीं। मुनियोंके समुदाय सदा उनसे सम्पर्क बनाये रखते थे
vāneyapuṣpanikarair ājyadhūmodgamair api | brāhmeṇa vapuṣā yuktā yuktatā munigaṇasya tāḥ ||
వైశంపాయనుడు అన్నాడు—అరణ్యపుష్పాల గుబ్బలు, ఘృతాహుతుల నుండి పైకి లేచే ధూమోద్గారాలు—ఇవన్నీ ఆ యజ్ఞవేదికలను అలంకరించుచుండెను. నిరంతర వేదధ్వని వ్యాపించి ఉండటంతో అవి బ్రాహ్మమైన—అంటే వేదమయమైన—శరీరంతో యుక్తమైనట్లుగా కనిపించెను; మునిగణములు నియమబద్ధమైన అనుష్ఠానసేవచేత వాటితో నిత్యం అనుసంధానమై ఉండిరి.
वैशम्पायन उवाच