Bhāgīrathī-tīra-śauca, Kurukṣetra-gamana, and Śatayūpa-āśrama-dīkṣā (गङ्गातीरशौच–कुरुक्षेत्रगमन–शतयूपाश्रमदीक्षा)
दूरादालक्षित: क्षत्ता तत्राख्यातो महीपते: । निवर्तमान: सहसा राजन् दृष्टवा55श्रमं प्रति,राजा धृतराष्ट्र इस प्रकार कह ही रहे थे कि मुखमें पत्थरका टुकड़ा लिये जटाधारी कृशकाय विदुरजी दूरसे आते दिखायी दिये। वे दिगम्बर (वस्त्रहीन) थे। उनके सारे शरीरमें मैल जमी हुई थी। वे वनमें उड़ती हुई धूलोंसे नहा गये थे। राजा युधिष्ठिरको उनके आनेकी सूचना दी गयी। राजन्! विदुरजी उस आश्रमकी ओर देखकर सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े
dūrād ālakṣitaḥ kṣattā tatrākhyāto mahīpate | nivartamānaḥ sahasā rājan dṛṣṭvāśramaṃ prati ||
దూరం నుంచే క్షత్తా విదురుడు గుర్తించబడి, అక్కడ రాజుకు అతని రాక వార్త తెలియజేయబడింది. కానీ రాజా! ఆశ్రమం వైపు చూసిన వెంటనే అతడు అకస్మాత్తుగా వెనుదిరిగి వెనక్కి తగ్గసాగాడు.
वैशम्पायन उवाच