/ अपन का बा | अपर ३-स्मृतियोंमें निम्नलिखित आठ विवाह बतलाये गये हैं--ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, गान्धर्व, आसुर, राक्षस और पैशाच। किंतु यहाँ १ ब्राह्म, २ प्राजापत्य, ३ गान्धर्व, ४ आसुर और ५ राक्षस--इन्हीं पाँच विवाहोंका उल्लेख किया गया है; अतः यहाँ जो ब्राह्म विवाह है उसीमें स्मृतिकथित दैव और आर्ष विवाहोंका भी अन्तर्भाव समझना चाहिये। इसी प्रकार यहाँ बताये हुए राक्षस विवाहमें उपर्युक्त पैशाच विवाहका समावेश कर लेना चाहिये। प्राजापत्यको ही 'क्षात्र” विवाह भी कहा गया है। २-सापिण्ड्य निवृत्तिके सम्बन्धमें स्मृतिका वचन है--वध्वा वरस्य वा तात: कूटस्थाद् यदि सप्तम: । पंचमी चेत्तयोर्माता तत्सापिण्ड्यं निवर्तते ।। अर्थात् “यदि वर अथवा कन्याका पिता मूल पुरुषसे सातवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुआ है तथा माता पाँचवी पीढ़ीमें पैदा हुई है तो वर और कनन््याके लिये सापिण्ड्यकी निवृत्ति हो जाती है। पिताकी ओरका सापिण्ड्य सात पीढ़ीतक चलता है और माताका सापिण्ड्य पाँच पीढ़ीतक। सात पीढ़ीमें एक तो पिण्ड देनेवाला होता है, तीन पिण्डभागी होते हैं और तीन लेपभागी होते हैं। > भीष्मजी काशिराजकी तीन कन्याओंको हरकर लाये थे, उनमेंसे दोको एक श्रेणीमें रखकर एकवचनका प्रयोग किया गया है, यह मानना चाहिये; तभी आदिपर्व अध्याय १०२ के वर्णनकी संगति ठीक लग सकती है। पजञज्चचत्वारिशो< ध्याय: कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार युधिछिर उवाच कन्याया: प्राप्तशुल्काया: पतिक्नैज्ञास्ति कश्नन । तत्र का प्रतिपत्ति: स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जिस कन्याका मूल्य ले लिया गया हो उसका ब्याह करनेके लिये यदि कोई उपस्थित न हो, अर्थात् मूल्य देनेवाला परदेश चला गया हो और उसके भयसे दूसरा पुरुष भी उस कनन््यासे विवाह करनेको तैयार न हो तो उसके पिताको क्या करना चाहिये? यह मुझे बताइये
yudhiṣṭhira uvāca | kanyāyāḥ prāptaśulkāyāḥ patiḥ na jñāyate kaścana | tatra kā pratipattiḥ syāt tan me brūhi pitāmaha ||
యుధిష్ఠిరుడు అన్నాడు— పితామహా! ఒక కన్యకు ముందే శుల్కం (వివాహధనం) స్వీకరించబడింది; కానీ ఇప్పుడు ఆమెకు వరుడు లేడు—శుల్కం ఇచ్చినవాడు పరదేశానికి వెళ్లిపోయాడు, అతని భయంతో మరెవ్వరూ ఆమెను వివాహం చేసుకోవడానికి సిద్ధపడటం లేదు—అప్పుడు ఆమె తండ్రి ఏం చేయాలి? దయచేసి చెప్పండి।
युधिछिर उवाच
The verse frames a dharma-legal dilemma: once a bride-price has been accepted, the father’s freedom to remarry the daughter is ethically constrained. Yudhiṣṭhira seeks a principled procedure that protects the maiden’s welfare while respecting obligations created by accepting śulka.
In Anuśāsana Parva, Yudhiṣṭhira questions Bhīṣma on rules of conduct. Here he presents a specific case: the bride-price has been taken, but the intended groom is absent and others fear marrying her; he asks Bhīṣma what the father should do next according to dharma.