Devaśarmā–Vipula Dialogue on Ahorātra–Ṛtu as Moral Witnesses (अनुशासन पर्व, अध्याय ४३)
न हि स्त्रीभ्य: परं पुत्र पापीय: किंचिदस्ति वै | अनि्निहि प्रमदा दीप्तो मायाश्ष मयजा विभो,बेटा! स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। यौवन-मदसे उन्मत्त रहनेवाली स्त्रियाँ वास्तवमें प्रजवलित अग्निके समान हैं। प्रभो! वे मयदानवकी रची हुई माया हैं
na hi strībhyāḥ paraṃ putra pāpīyaḥ kiñcid asti vai | agnir hi pramadā dīpto māyā ca mayajā vibho ||
భీష్ముడు పలికెను—బాలా! స్త్రీలకన్నా అధిక పాపిష్ఠమైనది మరొకటి లేదు. యౌవన మదంతో ఉన్మత్తమైన స్త్రీ జ్వలించే అగ్నివలె ఉంటుంది; ప్రభో! ఆమె దానవ మయుడు నిర్మించిన మాయ—ఒక మోసం—అని చెప్పబడుతుంది।
भीष्म उवाच