अध्याय १६ — शङ्कर-उमा-वरदानम् तथा तण्डि-स्तुतिः (Śaṅkara–Umā Boon-Granting and Taṇḍi’s Hymn)
य॑ ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरणं चापि विद्यते । यं विदित्वा पर वेद्यं वेदितव्यं न विद्यते,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
yaṁ jñātvā na punarjanma maraṇaṁ cāpi vidyate | yaṁ viditvā para-vedyaṁ veditavyaṁ na vidyate |
వాయువు పలికెను— ఆయనను తెలిసినచో పునర్జన్మ లేదు; మరణమును కూడ బంధనముగా అనుభవించరు. ఆయనను తెలిసినచో ఆయనకన్నా పరమైన జ్ఞేయము మరొకటి మిగలదు.
वायुदेव उवाच
The verse teaches the Mahābhārata’s liberation doctrine: realization of the supreme principle ends saṁsāra—there is no further compulsion of rebirth and death—and it is the final, unsurpassed knowledge beyond which nothing higher remains to be sought.
Vāyu is speaking in a didactic passage, praising the supreme reality as the ultimate object of knowledge. The statement functions as a climax of instruction: it identifies the goal that sages seek and frames it as the decisive knowledge that frees one from all cyclical bondage.