अध्याय १६ — शङ्कर-उमा-वरदानम् तथा तण्डि-स्तुतिः (Śaṅkara–Umā Boon-Granting and Taṇḍi’s Hymn)
दुर्विज्ञेगमसंख्येयं दुष्प्रपमकृतात्मभि: । योनिं विश्वस्थ जगतस्तमस: परत: परम्,उनका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। वे अप्रमेय हैं। जिन्होंने अपने अन्त:ः:करणको पवित्र एवं वशीभूत नहीं किया है, उनके लिये वे सर्वथा दुर्लभ हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं। अज्ञानमय अन्धकारसे अत्यन्त परे हैं
durvijñeyam asaṅkhyeyaṁ duṣprāpam akṛtātmabhiḥ | yoniṁ viśvasya jagatas tamasaḥ parataḥ param ||
వాయువు పలికెను—“ఆయనను తెలుసుకొనుట అత్యంత దుర్లభము; ఆయన అసంఖ్యేయుడు, అప్రమేయుడు. ఆత్మనిగ్రహము, అంతఃశుద్ధి లేనివారికి ఆయన దుష్ప్రాప్యుడు. సమస్త జగత్తుకు యోని—కారణము—ఆయనే; అజ్ఞానాంధకారమునకు కూడా అతీతుడై పరాత్పరుడై ఉన్నాడు.”
वायुदेव उवाच