स वरैश्छन्दितस्तेन नूपो वचनमत्रवीत् । सहस्रबाहुर्भूयां वै चमूमध्ये गृहेडन्यथा,विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा--“भगवन! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ] इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें”
sa varaiś chanditas tena nūpo vacanam abravīt | sahasrabāhur bhūyāṃ vai camūmadhye gṛhe ’nyathā ||
భీష్ముడు పలికెను—ఆ ఋషి వరాలు కోరుకొనుమని ప్రేరేపించగా రాజు ఇలా పలికెను—“యుద్ధంలో, సేన మధ్యలో, నేను సహస్రబాహువుగా ఉండుగాక; గృహంలో మాత్రం ఇతరథా, అంటే ద్విభుజుడిగానే ఉండుగాక. రణభూమిలో సర్వసైనికులు నా వెయ్యి భుజాలను దర్శించుగాక।”
भीष्म उवाच
Power should be bounded by dharma: extraordinary force may be sought for protecting and winning in righteous battle, but personal life should remain governed by restraint and normal ethical limits.
A sage invites the king to ask for boons. The king requests a miraculous form—thousand arms visible to the army in battle—while remaining ordinary at home, distinguishing public martial duty from private conduct.