मानसतीर्थ-शौचप्रशंसा | Praise of the ‘Mental Tīrtha’ and the Marks of Purity
दिवसे पउ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्,अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकमोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है
divase pañcame yas tu prāśnīyād ekabhojanam, anasūyur apāpastho dvādaśāhaphalaṁ labhet.
ప్రతి ఐదవ రోజున ఒక్కసారే భోజనం చేసి, అసూయలేని వాడై పాపానికి దూరంగా స్థిరంగా ఉండేవాడు ద్వాదశాహ యజ్ఞఫలాన్ని పొందుతాడు.
भीष्म उवाच