Janamejaya’s Request for Expansion; Vaiśampāyana’s Authorization and Phalāśruti of the Mahābhārata
Jaya
सुवर्ण रजतं गाश्न यच्चान्यन्मन्यसे विभो । तत् ते दद्यां वरं विप्र न निवर्तेत् क्रतुर्मम,“विप्रवर! आप सोना, चाँदी, गौ तथा अन्य अभीष्ट वस्तुओंको, जिन्हें आप ठीक समझते हों, माँग लें। प्रभो! वह मुँहमाँगा वर मैं आपको दे सकता हूँ, किंतु मेरा यह यज्ञ बंद नहीं होना चाहिये”
ఓ విప్రవరా! నీవు బంగారం, వెండి, గోవులు మరియు నీకు ఇష్టమైన ఇతర దేనినైనా కోరుము—ఆ వరమును నేను ఇస్తాను; కాని నా ఈ క్రతువు (యజ్ఞము) నిలిచిపోవకూడదు.
आस्तीक उवाच