Hiḍimbā’s Account and the Bhīma–Hiḍimba Engagement (आदि पर्व, अध्याय १४२)
दुर्योधन उवाच एवमेतन्मया तात भावितं दोषमात्मनि । दृष्टवा प्रकृतय: सर्वा अर्थमानेन पूजिता:,दुर्योधन बोला--पिताजी! मैंने भी अपने हृदयमें इस दोष (प्रजाके विरोधी होने)-की सम्भावना की थी और इसीपर दृष्टि रखकर पहले ही अर्थ और सम्मानके द्वारा समस्त प्रजाका आदर-सत्कार किया है
దుర్యోధనుడు అన్నాడు—తండ్రీ! నా హృదయంలోనూ ఈ దోషం కలుగవచ్చునని నేను ముందే భావించాను; అందుకే ధనం మరియు గౌరవంతో సమస్త ప్రజలను ముందుగానే సత్కరించాను.
दुर्योधन उवाच