Adhyāya 123 — Droṇa’s Pedagogy: Arjuna’s Preeminence, Ekalavya’s Self-Training, and the Bhāsa-Lakṣya Trial
मृगव्याधश्च सर्पश्न निर्क्रतिश्न महायशा: । अजैकपादहिर्बुध्न्य: पिनाकी च परंतप,शत्रुदमन महाराज! मृगव्याध और सर्प, महा-यशस्वी निर्क्रति एवं अजैकपाद, अहिर्बुध््य और पिनाकी, दहन तथा ईश्वर, कपाली एवं स्थाणु तथा भगवान् भग--ये ग्यारह रुद्र भी वहाँ आकाशमें आकर खड़े थे
శత్రుదమన మహారాజా! మృగవ్యాధుడు, సర్పుడు, మహాయశస్సుగల నిరృతి, అజైకపాదు, అహిర్బుధ్న్యుడు, పినాకీ—ఈ రుద్రులూ అక్కడ ఆకాశంలోకి వచ్చి నిలిచారు.
वैशम्पायन उवाच