बुद्धया विचिन्तयामास वीरा: केन निपातिता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तत्पश्चात् धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात् अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है
buddhyā vicintayāmāsa vīrāḥ kena nipātitāḥ | dharmaputro mahābāhur vilalāpa suvistaram ||
அப்போது மகாபாகு தர்மபுத்திரன் யுதிஷ்டிரன் நீண்ட நேரம் புலம்பிய பின், நிலைத்த புத்தியுடன் சிந்தித்தான்—“இந்த வீரர்களை யார் வீழ்த்தினார்?”
वैशग्पायन उवाच
Grief is not the end-point; the dhārmic response is to steady the mind and seek truth through reasoned inquiry (buddhi), avoiding impulsive blame or retaliation without evidence.
Yudhiṣṭhira, overwhelmed by sorrow at seeing the heroes fallen, laments for a long time and then begins to analyze who could have caused their fall—shifting from mourning to investigation.