Yudhiṣṭhira’s Lament on Kāla and Daiva after Draupadī’s Recovery (आरण्यक पर्व, अध्याय २५७)
यदा क्रोधहविर्मोक्ता धार्तराष्ट्रेषु पाण्डव: । आगगन्ताहं तदास्मीति वाच्यस्ते स सुयोधन:,धर्मराजकी यह बात सुनकर भीमसेनने दूतसे इस प्रकार कहा--'दूत! तुम राजा दुर्योधनसे जाकर यह कह देना कि सम्राट् धर्मराज युधिष्ठिर तेरह वर्ष बीतनेके पश्चात् उस समय वहाँ पधारेंगे जब कि रणयज्ञमें अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रजजलित की हुई रोषान्निमें वे तुम्हारी आहुति देंगे। जब रोषकी आगमें जलते हुए धृतराष्ट्रके पुत्रोंपर पाण्डव अपने क्रोधरूपी घीकी आहुति डालनेको उद्यत होंगे, उस समय मैं (भीमसेन) वहाँ पदार्पण करूँगा”
yadā krodha-havir-moktā dhārtarāṣṭreṣu pāṇḍavaḥ | āgantāhaṃ tadāsmīti vācyas te sa suyodhanaḥ ||
‘சுயோதனனிடம் சொல்— பாண்டவர்கள் துருதராஷ்டிரப் புதல்வர்கள்மேல் கோபமெனும் ஆஹுதியைச் செலுத்தத் தயாராகும் போது, அப்பொழுதே நானும் அங்கே வருவேன்.’
वैशम्पायन उवाच