Bhīṣma’s Admonition; Duryodhana’s Rājasūya Aspiration and the Proposal of a Vaiṣṇava-satra
ऋद्धया परमया युक्तो महेन्द्र इव वज्रभृत् । यदृच्छया च तत्रस्थो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:,उसी सरोवरके तटपर वज्रधारी इन्द्रके समान उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बुद्धिमान धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर अपनी धर्मपत्नी महारानी द्रौपदीके साथ साद्यस्क (एक दिनमें पूर्ण होनेवाले) राजर्षियज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस यज्ञमें उनके साथ बहुत-से वनवासी दिद्दान् ब्राह्मण भी थे। राजा वनमें सुलभ होनेवाली सामग्रीद्वारा दिव्य विधिसे यज्ञ कर रहे थे। वे उसी सरोवरके आस-पास कुटी बनाकर रहते थे
ṛddhayā paramayā yukto mahendra iva vajrabhṛt | yadṛcchayā ca tatrastho dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ ||
உயர்ந்த செல்வச் சிறப்பால் கூடியவனாய், வஜ்ரம் தாங்கும் மகேந்திரனைப் போலத் தர்மபுத்திரன் யுதிஷ்டிரன் தற்செயலாக அங்கே தங்கியிருந்தான்.
वैशम्पायन उवाच