Previous Verse
Next Verse

Shloka 116

स्कन्दसेनापत्याभिषेकः

Skanda’s Consecration as Devasenāpati

अपश्यदग्निवल्लोकांस्तापयन्तं महामुनिम्‌ । “जान पड़ता है, तपस्यामें लग जानेसे मेरा अग्नित्व नष्ट हो गया। अब मैं पुन: किस प्रकार अग्नि हो सकता हूँ?” यह विचार करते हुए उन्होंने देखा कि महामुनि अंगिरा अग्निकी ही भाँति प्रकाशित हो सम्पूर्ण जगत्‌को ताप दे रहे

அவன் கண்டான்—மகாமுனி (அங்கிரஸர்) அக்னியைப் போல ஒளிர்ந்து எல்லா உலகங்களையும் வெப்பமூட்டுகிறார்.

युधिछिर उवाच