Nahūṣa-Ājagara Saṃvāda: Yudhiṣṭhira’s Definition of Brāhmaṇa and the ‘Vedyam’ Debate
यथागतं मार्गमवेक्षमाण: पुनर्गिरिं चैव निरीक्षमाण: ततो महात्मा स विशुद्धबुद्धि: सम्प्रार्थयामास नगेन््द्रवर्यम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले उत्तम ओजसे सम्पन्न श्रेष्ठ महात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिने उस समय उन सबके अभिप्रायको जानकर कुबेरके निवासस्थान उस गन्धमादन पर्वतकी प्रदक्षिणा की। फिर उन्होंने वहाँके भवनों, नदियों, सरोवरों तथा समस्त राक्षसोंसे विदा ली। इसके बाद वे जिस मार्गसे आये थे, उसकी ओर देखने लगे। तदनन्तर उन विशुद्धबुद्धि महात्मा युधिष्ठिरने पुनः गन्धमादन पर्वतकी ओर देखते हुए उस श्रेष्ठ गिरिराजसे इस प्रकार प्रार्थना की
yathāgataṁ mārgam avekṣamāṇaḥ punar giriṁ caiva nirīkṣamāṇaḥ | tato mahātmā sa viśuddhabuddhiḥ samprārthayāmāsa nagendravaryam ||
தாம் வந்த பாதையை நோக்கியும், மீண்டும் அந்த மலையையும் உற்றுநோக்கியும், தூய அறிவுடைய அந்த மகாத்மா மலைகளின் அரசனாகிய சிறந்தவனிடம் வேண்டுதல் தொடங்கினான்.
वैशम्पायन उवाच