Kubera’s Arrival and the Disclosure of Agastya’s Curse
Vaiśaṃpāyana–Janamejaya Narrative
उवाच वचन राजन् कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । राजन् किंनाम सत्कृत्यं क्षत्रियस्यास्त्यतोडधिकम्,“इस आगामी मुहूर्तके आते ही इस राक्षसके प्राण नहीं रहेंगे।! इधर सहदेवने उस मूढ़ राक्षषकी ओर देखते हुए कुन्तीनन्दन युधिष्ठिस्से कहा--'राजन्! क्षत्रियके लिये इससे अधिक सत्कर्म क्या होगा कि वह युद्धमें शत्रुका सामना करते हुए प्राणोंका त्याग कर दे अथवा शत्रुको ही जीत ले। राजन्! इस प्रकार यह हमें अथवा हम इसे युद्ध करते हुए मार डालें। परंतप महाबाहु नरेश! यह क्षत्रिय धर्मके अनुकूल देश-काल प्राप्त हुआ है। यह समय यथार्थ पराक्रम प्रकट करनेके लिये है
vaiśampāyana uvāca | uvāca vacanaṁ rājan kuntīputraṁ yudhiṣṭhiram | rājan kiṁ nāma satkṛtyaṁ kṣatriyasyāsty ato 'dhikam ||
Vaiśampāyana said: Addressing Kuntī’s son Yudhiṣṭhira, he spoke these words: “O King, what noble deed could there be for a kṣatriya greater than this?”
वैशम्पायन उवाच