Kubera’s Arrival and the Disclosure of Agastya’s Curse
Vaiśaṃpāyana–Janamejaya Narrative
अधर्म चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्पसि केवलम् । एतामट्य परामृश्य स्त्रियं राक्षस मानुषीम्,'ऐसी दशामें तू व्यर्थ मृत्युका ही अधिकारी है और आज व्यर्थ ही तुम्हारे प्राण नष्ट हो जायँगे। यदि तेरी बुद्धि दुष्टतापर ही उतर आयी है और तू सम्पूर्ण धर्मोको भी छोड़ बैठा है, तो हमें हमारे अस्त्र देकर युद्ध कर तथा उसमें विजयी होनेपर द्रौपदीको ले जा। यदि तू अज्ञानवश यह विश्वासघात या अपहरण कर्म करेगा, तो संसारमें तुझे केवल अधर्म और अकीर्ति ही प्राप्त होगी। निशाचर! आज तूने इस मानवजातिकी स्त्रीका स्पर्श करके जो पाप किया है, यह भयंकर विष है, जिसे तूने घड़ेमें घोलकर पी लिया है।' इतना कहकर युधिष्ठिर उसके लिये बहुत भारी हो गये
adharmaṃ cāpy akīrtiṃ ca loke prāpsyasi kevalam | etām aṭya parāmṛśya striyaṃ rākṣasa mānuṣīm ||
இந்த உலகில் உனக்குக் கிடைப்பது அதர்மமும் அவப்பெயரும் மட்டுமே. ஓ ராட்சசா! இந்த மனிதப் பெண்ணை அலைந்து திரிந்து பிடித்து தொட்டதனால் நீ கொடிய பாவத்தைச் சேர்த்துக் கொண்டாய்.
वैशम्पायन उवाच