(तस्मै रथवरो युक्त: शुशुभे लोकविश्रुत: । वाजिभि: शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबनलाहकै: ।। भगवानके लिये जोतकर खड़ा किया हुआ वह विश्वविख्यात श्रेष्ठ रथ बड़ी शोभा पा रहा था। उसमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे। शैब्यस्तु शुकपत्राभ: सुग्रीव: किंशुकप्रभ: । मेघपुष्पो मेघवर्ण: पाण्डुरस्तु बलाहक: ।। उनमेंसे शैब्यका रंग तोतेकी पाँखके समान हरा था। सुग्रीव पलासके फूलकी भाँति लाल था। मेघपुष्पकी कान्ति मेघोंके ही समान थी और बलाहक सफेद था। दक्षिणं चावहच्छैब्य: सुग्रीव: सव्यतो5वहत् । पृष्ठवाहौ तयोरास्तां मेघपुष्पबनलाहकौ ।। शैब्य दाहिने भागमें जुतकर उस रथका वहन करता था और सुग्रीव बाँयें भागमें। मेघपुष्प और बलाहक क्रमश: इनके पीछे जुते हुए थे। वैनतेय: स्थितस्तस्यां प्रभाकरमिव स्पृशन् । तस्य सत्त्ववत: केतौ भुजगारिरशो भत ।। सत्वगुणके अधिष्ठानस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके रथमें लगे हुए ध्वजदण्डकी उस पताकामें सूर्यका स्पर्श करते हुए-से सर्पशत्रु विनतानन्दन गरुड विराज रहे थे। तस्य कीर्तिमतस्तेन भास्वरेण विराजता । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठ: पतगेन्द्रेण केतुना ।। कीर्तिमान् श्रीकृष्णका वह श्रेष्ठ रथ उस उज्ज्वल एवं प्रकाशमान गरुडथ्वजके द्वारा बड़ी शोभा पा रहा था। रुक्मजालै: पताकाभि: सौवर्णेन च केतुना । बभूव स रथश्रेष्ठ; कालसूर्य इवोदित: ।। सोनेकी जालियों, पताकाओं तथा सुवर्णमय ध्वजके द्वारा भगवान्का वह उत्तम रथ प्रलयकालमें उदित हुए सूर्यके समान उद्धासित हो रहा था। पक्षिध्वजवितानैश्न रुक्मजालकृतान्तरै: । दण्डमार्गविभागैश्व सुकृतैर्विश्वकर्मणा ।। प्रवालमणिहेमैश्व मुक्तावैडूर्य भूषणै: । किड्किणीशतसड्चैश्व वालजालकृतान्तरै: ।। कार्तस्वरमयीभिश्न पद्मिनीभिरलंकृत: । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठस्तापनीयैश्न पादपै: ।। व्याप्रसिंहवराहैश्न गोवृषैर्मुगपक्षिभि: । ताराभिभर्भास्करैश्लापि वारणैश्न हिरण्मयै: ।। वज्ाड्कुशविमानैश्व कूबरावृत्तसंधिषु ।) उस रथके गरुडध्वज, चँदोवे, स्वर्णजालविभूषित मध्यभाग तथा पृथक्-पृथक् दण्डमार्गोका विश्वकर्माने सुन्दर ढंगसे निर्माण किया था। प्रवाल (मूँगा), मणि, सुवर्ण, वैदूर्य, मुक्ता आदि विविध आभूषणों, शत-शत क्षुद्रधघण्टिकाओं तथा वालमणिकी झालरोंसे उस रथके अन्तःप्रदेश सुसज्जित किये गये थे। सुवर्णमय कमलिनियों, तपाये हुए सुवर्णके ही वृक्षों तथा व्याप्र, सिंह, वराह, वृषभ, मृग, पक्षी, तारा, सूर्य और हाथियोंकी स्वर्णमयी प्रतिमाओंसे उस श्रेष्ठ रथकी अत्यन्त शोभा हो रही थी। कूबर (युगंधर)-की गोलाकार संधियोंमें वज्ञ, अंकुश तथा विमानकी आकृतियोंसे उस रथको विभूषित किया गया था। तमुपस्थितमाज्ञाय रथं दिव्यं महामना: । महाभ्रघननिर्घोषं सर्वरत्नविभूषितम्,महान् सजल मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित हुए उस दिव्य रथको उपस्थित जान अग्नि एवं ब्राह्मणोंको दाहिने करके, गलेमें कौस्तुभभणि डालकर, अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए, कौरवोंसे घिरकर एवं वृष्णिवंशी वीरोंसे सुरक्षित हो समस्त यादवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले महामना शूरनन्दन जनार्दन श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हुए
tasmai rathavaro yuktaḥ śuśubhe lokaviśrutaḥ | vājibhiḥ śaibyasugrīvameghapuṣpabalāhakaiḥ ||
அவருக்காக முன்பே பூட்டப்பட்ட, உலகில் புகழ்பெற்ற சிறந்த ரதம் பேரழகுடன் விளங்கியது. அதில் சைப்யன், சுக்ரீவன், மேகபுஷ்பன், பலாஹகன் எனும் நான்கு குதிரைகள் இணைக்கப்பட்டிருந்தன.
वैशम्पायन उवाच
The verse implicitly contrasts righteous power with chaotic force: true authority aligned with dharma appears as ordered readiness and auspicious splendor. Even on the brink of conflict, the epic frames Kṛṣṇa’s role through harmony, fame, and disciplined preparation rather than mere intimidation.
Vaiśaṃpāyana describes a celebrated chariot prepared for its lord, already harnessed with four named horses—Śaibya, Sugrīva, Meghapuṣpa, and Balāhaka—setting the scene for Kṛṣṇa’s consequential movement within the tense pre-war events of the Udyoga Parva.